संदेश

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है ग़ौर

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है ग़ौर, नाम मिला कुछ और, तो शक्ल-अक्ल कुछ और, शक्ल-अक्ल कुछ और, नयनसुख देखे काने, बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने, कह 'काका' कवि, दयाराम जी मारें मच्छर, विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर... मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप, श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप, जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट-पैंट में, ज्ञानचंद छह बार फ़ेल हो गए टैंथ में, कह 'काका', ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे, पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे... देख अशर्फ़ीलाल के घर में टूटी खाट, सेठ भिखारीदास के मील चल रहे आठ, मील चल रहे आठ, करम के मिटें न लेखे, धनीराम जी हमने प्रायः निर्धन देखे, कह 'काका' कवि, दूल्हेराम मर गए कुंवारे, बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बेचारे... दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल, मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल, रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं, ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भौंक रहे हैं, ‘काका’ छै फिट लंबे छोटूराम बनाए, नाम दिगंबरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए... पेट न अपना भर सके, जीवन भर जगपाल, बिना सूंड़ के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल, मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज़ सम्ह...

इतिहास परीक्षा थी उस दिन,

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था, जब से जागा था सुबह, तभी से, बायां नयन फड़कता था... जो उत्तर मैंने याद किए, उनमें से आधे याद हुए, वे भी स्कूल पहुंचने तक, यादों में ही बरबाद हुए... जो सीट दिखाई दी खाली, उस पर ही डटकर जा बैठा, था एक निरीक्षक कमरे में, वह आया, झल्लाया, ऐंठा... रे, रे, तेरा है ध्यान किधर, क्यों करके आया देरी है, तू यहां कहां पर आ बैठा, उठ जा, यह कुर्सी मेरी है... मैं उचका एक उचक्के-सा, मुझमें सीटों में मैच हुआ, चकरा-टकराकर कहीं एक, कुर्सी के द्बारा कैच हुआ... पर्चे पर मेरी नज़र पड़ी, तो सारा बदन पसीना था, फिर भी पर्चे से डरा नहीं जो, यह मेरा ही सीना था... कॉपी के बरगद पर मैंने, बस, कलम-कुल्हाड़ा दे मारा, घंटे-भर के भीतर कर डाला, प्रश्नों का वारा-न्यारा... गौतम जो बुद्ध हुए जाकर, वह गांधी जी के चेले थे, दोनों बचपन में नेहरू के संग, आंख-मिचौनी खेले थे... होटल का मालिक था अशोक, जो ताज महल में रहता था, ओ अंग्रेजों, भारत छोड़ो, वह लाल किले से कहता था... झांसा दे जाती थी सबको, ऐसी थी झांसी की रानी, अक्सर अशोक के होटल में, खाया करती थी बिरयानी... ऐसे ही चुन-चुनकर ...
वैसे तो एक शरीफ इंसान हूं... आप ही की तरह श्रीमान हूं... मगर अपनी आंख से बहुत परेशान हूं... अपने आप चलती है... लोग समझते हैं, चलाई गई है... जान-बूझकर मिलाई गई है... एक बार बचपन में... शायद सन पचपन में... क्लास में... एक लड़की बैठी थी पास में... नाम था सुरेखा... उसने हमें देखा... और बांई चल गई... लड़की हाय-हाय... क्लास छोड़ बाहर निकल गई... थोड़ी देर बाद... हमें है याद... प्रिंसिपल ने बुलाया... लंबा-चौड़ा लेक्चर पिलाया... हमने कहा, जी, भूल हो गई... वो बोले, ऐसा भी होता है भूल में... शर्म नहीं आती, ऐसी गंदी हरकतें करते हो, स्कूल में... और इससे पहले कि, हकीकत बयान करते... कि फिर चल गई... प्रिंसिपल को खल गई... हुआ यह परिणाम... कट गया नाम... बमुश्किल तमाम... मिला एक काम... इंटरव्यू में, खड़े थे क्यू में... एक लड़की थी सामने अड़ी... अचानक मुड़ी... नजर उसकी हम पर पड़ी... और आंख चल गई... लड़की उछल गई... दूसरे उम्मीदवार चौंके... उस लडकी की साइड लेकर... हम पर भौंके... फिर क्या था... मार-मार जूते-चप्पल... फोड़ दिया बक्कल... सिर पर पांव रखकर भागे... ...

किसने तोड़ा शिव का धनुष

विद्यालय में आ गए इंस्पेक्टर स्कूल, छठी क्लास में पढ़ रहा विद्यार्थी हरफूल, विद्यार्थी हरफूल, प्रश्न उससे कर बैठे, किसने तोड़ा शिव का धनुष बताओ बेटे, छात्र सिटपिटा गया बिचारा, धीरज छोड़ा, हाथ जोड़कर बोला, सर, मैंने ना तोड़ा... यह उत्तर सुन आ गया, सर के सर को ताव, फौरन बुलवाए गए हेड्डमास्टर साब, हेड्डमास्टर साब, पढ़ाते हो क्या इनको, किसने तोड़ा धनुष नहीं मालूम है जिनको, हेडमास्टर भन्नाया, फिर तोड़ा किसने, झूठ बोलता है, जरूर तोड़ा है इसने... इंस्पेक्टर अब क्या कहे, मन ही मन मुसकात, ऑफिस में आकर हुई, मैनेजर से बात, मैनेजर से बात, छात्र में जितनी भी है, उसमें दुगुनी बुद्धि हेडमास्टर जी की है, मैनेजर बोला, जी, हम चन्दा कर लेंगे, नया धनुष उससे भी अच्छा बनवा देंगे... शिक्षा-मंत्री तक गए जब उनके जज़बात, माननीय गदगद हुए, बहुत खुशी की बात, बहुत खुशी की बात, धन्य हैं ऐसे बच्चे, अध्यापक, मैनेजर भी हैं कितने सच्चे, कह दो उनसे, चन्दा कुछ ज्यादा कर लेना, जो बैलेन्स बचे वह हमको भिजवा देना.